बाबा रामदेव जी का परिचय 🚩🚩
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बाबा रामदेवजी को क्यों कहते हैं पीरों का पीर? पाकिस्तान से मुस्लिम भक्त भी आते हैं बाबा के दरबार में
जैसलमेर। Baba Ramdev Ji राजस्थान के प्रसिद्ध लोक देवता हैं। 
Runicha (जैसलमेर) में बाबा का विशाल मंदिर है जहां दूर-दूर से श्रद्धालु उन्हें नमन करने आते हैं। रामदेवजी सामुदायिक सद्भाव तथा अमन के प्रतीक हैं। बाबा का अवतरण वि.सं. 1409 को भाद्रपद शुक्ल दूज के दिन तोमर वंशीय राजपूत तथा रूणीचा के शासक अजमलजी के घर हुआ।

उनकी माता का नाम मैणादे था। बाबा का संबंध राजवंश से था लेकिन उन्होंने पूरा जीवन शोषित, गरीब और पिछड़े लोगों के बीच बिताया। उन्होंने रूढिय़ों तथा छूआछूत का विरोध किया।

भक्त उन्हें प्यार से रामापीर या राम सा पीर भी कहते हैं। बाबा को Shri Krishna का अवतार माना जाता है। वे हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक भी माने जाते हैं। भक्तों का उनके प्रति समर्पण इतना है कि पाकिस्तान से मुस्लिम भक्त भी उन्हें नमन करने भारत आते हैं।

कुछ विद्वान मानते हैं कि बाबा का अवतरण वि.सं. 1409 में उडूकासमीर - बाड़मेर में हुआ। उन्होंने Runicha में समाधि ली थी, लेकिन बाबा के भक्तों के लिए इतिहास की इन तिथियों से ज्यादा उनकी कृपा महत्वपूर्ण है। आज भी यहां के शुभ कार्य बाबा के पूजन के बिना अधूरे हैं।

बाबा रामदेव जी का इतिहास (History of Baba Ramdev Ji) कहा जाता है कि जब Ramdev ji के चमत्कारों की चर्चा चारों ओर होने लगी तो मक्का (सऊदी अरब) से पांच पीर उनकी परीक्षा लेने आए। वे उनकी परख करना चाहते थे कि रामदेव के बारे में जो कहा जा रहा है, वह सच है या झूठ?

बाबा ने उनका आदर-सत्कार किया। जब भोजन के समय उनके लिए जाजम बिछाई गई तो एक पीर ने कहा, हम अपना कटोरा मक्का में ही भूल आए हैं। उसके बिना हम आपका भोजन ग्रहण नहीं कर सकते। इसके बाद सभी पीरों ने कहा कि वे भी अपने ही कटोरों में भोजन करना पसंद करेंगे।

रामदेवजी ने कहा, आतिथ्य हमारी परंपरा है। हम आपको निराश नहीं करेंगे। अपने कटोरों में भोजन ग्रहण करने की आपकी इच्छा पूरी होगी।

यह कहकर बाबा ने वे सभी कटोरे रूणीचा में ही प्रकट कर दिए जो पांचों पीर मक्का में इस्तेमाल करते थे। यह देखकर पीरों ने भी बाबा की शक्ति को प्रणाम किया और उन्होंने बाबा को पीरों के पीर की उपाधि दी।

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